two liner_मौसम  के मिज़ाज में/Mausam Ke Mijaj Me

akpमौसम  के मिज़ाज में,
सावन की बौछार पड़ी है
एक धुंधला सा चेहरा है सामने,
जो बारिश की की बूँदों के पार खड़ी है…..

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पुरानी ऐनक / Purani Ainak_Ankit AKP

पुरा1534597720944[1]नी ऐनक के पीछे की,
ये आँखें भी अब पुरानी हो चुकी हैं
इतनी पुरानी….
कि वो छवि भी अब धुंधली सी दिखती याद आती है जिसे पहली बार इन आँखों ने,
अपनी इसी पुरानी ऐनक के पीछे से देखा था !

 

अभी-अभी /Abhi-Abhi _Hindi Sensitive poem

अभी-अभी तो वह
रेंगा था
लोगों ने उसे कुचलना
शुरू कर दिया;
उसने लोगों से अपनी
जान बचानी चाही
तो लोगों ने उसे
हमला समझ लिया;
आखिर क्या किया
गुनाह है उसने
जो लोग उसे
अपना दुश्मन समझ बैठे;
मिली जिन्दगी उसे वही
जो मिली जिन्दगी औरों को
फिर क्यों उसकी जिन्दगी का
मोल नहीं है कोई ;
है रूप-रंग अलग तो क्या
वह भी जीना जानता है
है कीट-मकोडों से पहचान तो क्या
वह भी प्रकृति को महसूस करना जानता है;
आखिर वह भी प्रकृति की ही रचना है
उसी की गोद में पलता है
जिन्दगी के सफर में
खुद का हमसफर बनकर चलता है
लेकिन फिर भी खेल
उसकी जिन्दगी का ऐसा क्यों
कि अभी-अभी जिन्दगी
और उसी अभी-अभी में उसे मौत मिल गयी,
मौत मिल गयी….
उसकी अभी-अभी की इस
दो पल की जिन्दगी के खेल से
मुझे मेरी जिन्दगी की कीमत का एहसास हो गया
लेकिन अभी-अभी…..

मुझे रावण का जलना बिल्कुल समझ न आया_Ankit AKP

न जाने कैसा मंजर था उस रावण-दहन में
बच्चे की होंठों पे मुस्कान देखी,
तो रावण का जलना समझ में आया
लेकिन जब राम की भेष में धनुष उठाए उस शख़्स के चेहरे में एक सुकून भरी जैसी खुशी देखी,
तब मुझे रावण का जलना समझ बिल्कुल न आया
क्योंकि बच्चे के लिए तो जो सामने जलकर फूंका जा रहा था, वो तो बस एक पुतला है जिसके धूम-धड़ाके की आवाज से बच्चे के मन में किलकारी पैदा होती है और उसे देख वो मुस्कुराता है और वो मुस्कान समझ आती है
लेकिन उस शख़्स के लिए जो अपने आप में उस वक़्त तक राम था और वो जलता हुआ पुतला केवल एक पुतला नहीं था बल्कि साक्षात रावण था, क्योंकि सामने खड़ा वो धनुर्धारी शख़्स साक्षात राम का ही रूप था और इसी राम को उस रावण का वध करना था और तीर तानकर उसने ऐसा किया भी; पर जहाँ तक मुझे मालूम है, जब राम ने रावण का वध किया था तो अपने हाथों रावण का वध किये जाने से उस राम में तो निराशा थी
पर यहाँ….,
यहाँ तो उस शख़्स की जो राम की भेष में था, उसके होंठों पर तो एक अलग ही मुस्कान थी और ऐसे में इस राम के होंठों की मुस्कान देखकर वाकई,
मुझे रावण का जलना बिल्कुल समझ न आया 

अब मैं जिम्मेदार था/ Ab Main Jimmedar Tha

नादान था
दुनिया से अनजान था;
बेखबर हर बात से
क्या झूठ, क्या सच, क्या बेईमानी,
और क्या ईमान था;
हमेशा बस मैं यही सोचता
लोगों में कैसे इतना ज्ञान था
दुनिया भर की खबर जो रखते
भला उसमें क्या ईनाम था;
अब किन-किन बातों में,
किस-किस तरह का ज्ञान था
हमारी किन-किन जरूरतों में,
कहाँ और कितना विज्ञान था
ये सब जानना,
मेरे लिए कहाँ आसान था ;
फिर पता चला यही मेरा काम था
क्योंकि लोगों का ज्ञान ही उनका अभिमान था,
और दुनिया में इसी से उनका सम्मान था;
क्या कर्म, क्या ज्ञान, क्या अभिमान और क्या सम्मान,
इन सब की चाह में, मैं खासा परेशान था
पर बढ़ती उम्र और बढ़ती जिम्मेदारियों पर अब मेरा भी ध्यान था
ये ध्यान सब, बस मेरे अस्तित्व-निर्माण का ऐलान था
क्योंकि जिम्मेदार कहलाना ही मेरी जिंदगी का मुकाम था,
इसी में मेरा अपना स्वाभिमान था,
और इसी स्वाभिमान पर करना मुझे शान था;
फिर क्या था….,
लग गया जिम्मेदारियों को समझने,उन्हें पूरा करने,
और साथ ही जिन्दगी से कुछ सीखने;
जिम्मदारियों को निभाते, उन्हें पूरी करते
अब मैं भी हो चला सयान था
जिसपे मैं खुद भी बड़ा हैरान था;
पर यही हैरानी मेरी जिन्दगी की असली हकीकत थी
और हकीकत ये थी,
कि अब समाज में मेरा भी एक खास स्थान था,
जहाँ ‘जिम्मेदार’ मेरा पद और वही मेेरा उपनाम था;
अब शायद वाकई अपने पैरों पर खड़ा था
और अपने पैरों पर खड़े होने के एहसास से,
मेरा कन्धा भी अब हो चला बलवान था;
बस मैं अब बड़ा खुश था
इसके अलावा और क्या चाहिए था
अब तो हासिल कर लिया अपना एक जहान था
जहाँ अब न मैं नादान था,
और न ही किसी से अनजान था
क्योंकि अब मैं जिम्मेदार था…..
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वो इंसान है /Woh Insaan Hai_Ankit AKP

#वोइंसानहै
पता नहीं कौन है,
कहाँ से आया है ?
पहचान पूछो तो इंसान बताता है,
नाम पूछो तो काम बताता है
पता नहीं किस जगह,
किस जहान से आया है ?
वंश पूछो तो बन्दर याद दिलाता है,
मज़हब पूछो तो धर्म सिखाता है;
न किसी धर्म का भगवान है,
और न ही किसी मज़हब का अनुयायी है
पर हममें ही है वो, ये बताता है
पहचान हमारी अस्तित्व हमारा,
बस खुद से हमारा जुड़ा नाता समझाता है;
हर अच्छाई से उसका नाता है,
खुद के होने पर गर्व जताता है
हम इंसान का सार परिभाषित उससे
खुद का वो महत्व समझाता है
इंसानियत जिस भेष में बसती,
बस खुद को वही इंसान बतलाता है;
पर हम भी तो इंसान हैं आखिर
फिर क्यों खुद को हमसे अलग बताता है
शायद सच ही है
क्योंकि इंसान कहां अब इंसान रहा
इंसानियत से नाता टूट रहा
बुराई के घेरे में जो घिर जाए
बस वहीं इंसानियत दम तोड़ जाए;
बस इंसान वो वही बनकर आया है
बस हममें इंसानियत जगाने आया है
न जाने कितनी वजह हैं,
इंसान को अलग-अलग बांटने की
पर ‘अच्छाई’ वो बस एक यही वजह लेकर आया है

वो इंसान को इंसान बनाने आया है

पर साथ वो एक सवाल भी लाया है
कि क्यों जरूरत पड़ती है उसको ये बताने की,
कि इंसान है वो
और इस बात की शर्म भी उसको,
कि वो इंसान को इंसान बनाने आया है
वो इंसान है, वो इंसान है !
#latest #2018 #हिंदी

“गर्मी के दिन हैं आयें/Garmi Ke Din Hain Aaye” #Summerseason

“गर्मी के दिन हैं आयें” #Summerseason
फिर गर्मी के दिन हैं आयें
साथ धूप की छाया लायें
पंखा,कूलर,फ्रिज सब काम पे आयें
जो बिल बिजली का दुगुना लायें
भई! गर्मी के जो दिन हैं आयें;
दिन-दोपहर को मानो जैसे
सूरज दादा कहर बरसाए
ऐसे में घर की चार दीवारी ही भाए
जो उस कहर से हमें बचाए
भई! गर्मी के तो दिन हैं आयें;
गर्म मौसम का सफर है ऐसा
सारी दुनिया झुलस रही है
काम-काज कुछ मेहनत नहीं
दुनिया फिर भी पसीने में डूब रही है
वाकई! गर्मी के दिन हैं आयें;
दिन सूरज से तप गया
रात दिन के तपन से तप गया
ये गर्मी के दिन क्या आयें
इंसान सुकून भरी नींद को तरस गया;
गर्म मौसम का हाल सुनाने
सारे समाचार का हाल बेहाल रहा
हाय! ये सूरज तो यारो
पूरा दिन अंगार रहा;
गर्म मौसम की चाल तो देखो
हवा को भी लपेट लिया
जो कानों को सायं….से लगती
उसको ‘लू’ के नाम से बदनाम किया;
गर्मी के मौसम में यारों
ढलते सूरज का इन्तजार है रहता
हमें रात की चांदनी से प्यार है रहता
सुबह की मदमस्त हवा को छोड़
हर पल जीना दुश्वार है रहता;
न खेल मुनासिब लगता है
न बाहर जाना अच्छा लगता है
गर्मी के दिन में तो यारों
टीवी का प्रोग्राम ही अच्छा लगता है;
ये गर्मी के दिन हैं यारों
जो साथ धूप की छाया लायें
न स्कूल जायें न कॉलेज जायें
बस घर में ही आराम फरमायें;
गर्म मौसम का असर तो देखो
कि आलस भी हममें घर कर गई
जहाँ तहाँ न जाने कब
ये तो बेवक्त ही हमको नींद दे गई;
अब गर्मी का मौसम है तो क्या
आइसक्रीम,शरबत,ठण्डा भी तो है
बस इन्हीं के स्वाद ठिकानों में
गर्मी भी हमको भातो है;
ये गर्मी के दिन हैं यारों
भूले भूलाए न भूले है
न काटे कटाए कटे है
बस अब तो ये सोचकर ही यारों
दिल हमारे दहके है
कि गर्मी के दिन हैं आयें
जो साथ धूप की छाया लायें |